|
Posted on 14
July 07 सोशल फोबिया
(Social Phobia) एक ऐसा रोग है जिसमें रोगी अपरिचित लोगों से मिलने या चार लोगों के
सामने अपनी बात रखने से कतराता है, किसी औपचरिक स्थित में रोगी को ऐसा लगता है कि
वह लोगो के सामने सामान्य रूप से नहीं रह पायेगा और उससे कोई ऐसी हरकत हो जायेगी
जिससे उसे लज्जित होना पडेगा | उन्हें डर लगता है कि वे अपनी बात ठीक से नहीं कह
पायेगें क्यों कि वे बीच में ही बात भूल जायेंगे या उनकी जीभ लङखङा जायेगी| ऐसी
स्थिति में रोगी को तेज घबराहट होती है,उसके हाथ पैर कांपने लगते हैं, जुबान सूख जाती
है, पसीना छूट जाता है और वह भयभीत होने लगता है कुछ रोगी तो उल्टी होने या बार - बार
पेशाब लगने की भी शिकायत करते हैं इसी भय के चलते रोगी किसी शादी - विवाह में नहीं
जाते हैं और किसी सार्वजनिक स्थान जैसे रेस्तरां
(Restaurant) में खाना खाने से कतराते है वे
इंटरव्यू देने या मंच पर भाषण देने से दूर ही रहते हैं | बङी दुकान या भव्य शोरूम से
अपनी मनपसन्द चीज खरीदने के लिये भी हमेशा दूसरों पर निर्भर रहते हैं | इस बीमारी के
चलते लङके - लङकियों से आँख मिलाकर बात नहीं कर पाते है और तेज घबराहट व भय महसूस
करते हैं | इस रोग के चलते व्यक्ति का सामाजिक जीवन अस्त - व्यस्त हो जाता है | यह
बीमारी उनके काम काज मे भी अङचनें पैदा करती है क्योंकि वे नौकरी के दौरान नये लोगों
से मिलने से कतराते है |
कारण :
सोशल फोबिया ५-१० प्रतिशत लोगों में होता है | सामान्यतः
यह रोग २० वर्ष की आयु से पहले ही शुरू हो जाता है, और
ज्यादातर यह रोग ११ से १५ वर्ष के बच्चों में होता है |
पुरुषों की अपेक्षा यह रोग महिलाओं में अधिक देखा जाता है
| इस रोग के बनने और बङने में पारिवारिक माहौल का
महत्वपूर्ण योगदान होता है | यदि बच्चों का बहुत अधिक बचाव
किया जाये या उसके प्रति अधिक उपेक्षा कि भावना रखने से इस
रोग का जन्म होता है| यह रोग परिवारों में भी देखा जा सकता
है | यदि परिवार के किसी सदस्य को यह रोग है तो उसके
संबधियों को होने की संभावना होती है |
इलाज :
सोशल फोबिया के इलाज में दवाओं और मनोचिकित्सा
(counseling & psychotherapy) दोनो का ही प्रमुख स्थान है
| इस रोग के लिये दवाओं का चुनाव व्यक्तिकगत लक्षण को
ध्यान में रखते हुये किया जाता है | मनोचिकित्सा में रोगी
के साथ-साथ उसके परिजनों की भी सहायता ली जाती है |
|