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Posted on 1 September 2007
अस्थमा की औषधियां तथा
गर्भावस्था
माता तथा गर्भ में पल रहे शिशु दोंनों को अस्थमा
की औषधियों से होने वाले ज्ञात
खतरे अनियंत्रित अस्थमा के
ज्ञात खतरों से कहीं बडे होते हैं
| प्रसूति संबन्धी देखभाल
में अस्थमा संबंधी देखभाल को शामिल किया जाना चाहिए, अगर
संभब हो तो दोनों के लिए एक ही डॉक्टर की मदद लेनी चाहिए
अगर देखभाल में एक से अधिक डॉक्टर शामिल हो तो उनमें अच्छा
तालमेल होना चाहिए अस्थमा पर निरन्तर निगरानी रखते हुए उस
पर सही नियंत्रण का लक्ष्य प्राप्त किया जाता है इसमें
नियंत्रण रखने के लिए औषधियों की संख्या दिए जाने की
बारंबारता को बढाना तथा नियंत्रण की स्थिति में यथा संभव
उन्हें घटाना शामिल |
डॉक्टर से
प्रसूतिपूर्व प्रत्येक मुलाकात के दौरान अस्थमा की स्थिति
पर निगरानी रखी जानी चाहिए इसे ऑब्जेक्ट लंग फंक्शन जांचों
के जरिए किया जा सकता है |
ऑब्जेक्टिव आकलन मापक
ऑब्जेक्टिव आकलन मापक महत्वपूर्ण है क्योंकि कई परिवर्तन
गर्भावस्था से जुडे होते है जबकि कुछ परिवर्तन अस्थमा के
कारण होते है अस्थमा के आकलन तथा उस पर निगरानी रखने के
लिए ऑब्जेक्टिव मापक जरूरी है जिससे कि औषधियों में उचित
परिवर्तन किए जा सकें |
गर्भवती स्त्री निम्नलिखित का इस्तेमाल कर सकती है |
१ स्पायरोमेट्री
२ पीक फ्लो मीटर्स-पीक एसपिनेटरी फ्लो रेट की माप हेतु ,खासतौर
से जो स्त्रियां रोजाना दवाइयां लेती हों दोनो ही स्वसननली
में अवरोध के संकेतक है ये मापक गर्भावस्था के
साथ बदलते
नही हैं इसका लक्ष्य पल्मोनरी फंक्शन रेट्स को सामन्य या
सामान्य के आसपास रखना या रखने की कोशिश करना है |
भ्रूण हेतु आकलन मापक में निम्नलिखित शामिल
हैं -
१ अल्ट्रासाउन्ड
- भ्रूण के विकास का आरंभिक संकेत देने के
लिए पेट पर एक जैल लगाया जाता है तथा हांथ में पकडा
जानेवाला एक सेंसर भ्रूण का चित्र ग्रहण करता है जिन्हैं
एक कम्प्युटर स्क्रीन पर देखा जा सकता है |
२ इलेक्ट्रॉनिक फेटल हार्ट रेट मॉनिटरिंग
- मांके पेट मे
भ्रूण के ह्रदय की धसकन को सुनने के लिए एक डॉप्लर का
इस्तेमाल किया जाता है |
३ नॉन - स्ट्रेट टेस्ट -भ्रूण की सकुशलता सुनिश्चित करने के
लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है ये टेस्ट्स एक समय अवधि
में भ्रूण के ह्रदय की धडकनों पर निगरानी रखते है |
४ डेली किक चार्टस - इसका इस्तेमाल भ्रूण की गतिविधियों पर
नजर रखने के लिए किया जाता है यह रिकॉर्ड भावी मां द्वारा
उस समय लिया जाता है जब उसे महसूस होता है कि गर्भ में
मौजूद शिशु हिल-डुल रहा है या पैर चला रहा है भ्रूण की
गतिविधि के स्वरूप को देखने के लिए एक अरसे के बाद चार्टस
की तुलना की जा सकती है |
अस्थमा के दौरों से कैसे
निपटें:
१ इसका समाधान है इससे बचना .जहां तक हो सके दौरों से बचें
| २ अस्थमा के दौरों से बचने के लिए शीघ्र उपचार महत्वपूर्ण
है प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते ही राहत देने वाली औषधि
लें | वह औषधि लें जिससे पहले अच्छा आराम मिला हो |
३ अगर निम्नलिखित स्थितियां पैदा होती है तो गर्भवती स्त्री
को चिकित्सा उपचार मिलने में देरी नही होनी चाहिए यह एक
महत्वपूर्ण पहलू है |
४ औषधि से शीघ्रता से स्थिति में सुधार नही होता है |
५ सुधार कायम नही रहता है |
६ स्थिति और बिगडती है |
७ अस्थमा का दौरा गंभीर होता है |
८ भ्रूण के हिलने-डुलने की स्थिति में दिनोंदिन कमी महसूस
होती है | ९ याद रखें. आपको अपनी निर्धारित औषधियां नियमित रूप से
लेनी हैं |
गर्भावस्था के दौरान आपको निम्नलिखित औषधियों को लेने से
बचना चाहिए |
1 आयोडाइड्स - ये नवजात में घेंघा (गॉयटर) उत्पन्न कर सकते
हैं | 2 Tetracycline - इससे नवजात के दांत स्थायी रूप से दागी हो सकते हैं |
3
एस्पिरीन या एएसए उत्पाद - अगर भावी माता इस औषधि की
संवेदनशील रखती अहि तो गर्भावस्था के दौरान अस्थमा के दौरे
गंभीर रूप से घातक साबित हो सकता है |
४ एंटीहिस्टामिन्स - इसके प्रभाव स्पष्ट रूप से ज्ञात नही
हैं इसलिए संभव हो तो इनसे बचें या अपने डॉक्टर के साथ
सलाह मशविरा करें |
५ सल्फोनामाइड्स - देर से होने वाली गर्भावस्था में ये नवजात
शिशु के रक्त में बिलिरूबिन को बढा सकते हैं ,अंत में ,एक
बात गांठ बांध लें कि कोई भी दवाई अपने डॉक्टर से पूछकर
ही लें चाहे वे दुकान पर सीधे बिकनेवाली ही क्यों न हो |
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