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Posted on 15
July 07 इस दुनिया
में हम ध्वनि के माध्यम से एक - दूसरे से सम्पर्क बनाये
रखते हैं | आपसी बोलचाल का जरिया भी यही आवाज है | अपने
आसपास के वातावरण और लोगों के सम्पर्क में रहने के लिये हमें
सुनाई( सामान्य सुनाई देने की क्षमता) देना बहुत जरूरी है
| बहरों की तन्हा जिंदगी की कल्पना भी हम नहीं कर सकते
हैं | शैशवकाल मैं बोलने कि क्षमता के विकास मैं सामान्यतः
सुनाई देना महत्वपूर्ण है | अतः समान्य सुनाई पङने की
जरूरत को समझना जरूरी है | अपने देश मै एक अनुमान के
अनुसार लगभग १० फीसदी आबादी को सुनाई देने मैं कठिनाई (बहरापन) है | किन्तु इससे प्रभावित व्यक्तियों को काफी बाद मैं पता चलता
है, क्योंकि बहरेपन की प्रक्रिया बेहद धीमी, दर्दरहित और
कभी कभार ही पकङ में आती है |
लक्षण
(१) औरतौं और बच्चों की महीन आवाज़ यानि हाई पिच साउण्ड
सुनाई न देना |
(२) थिएटर अथवा सभास्थल मैं सुनाई पड्ने की कठिनाई , जहाँ
ध्वनि का स्रोत दूर हो |
(३) सामूहिक परिचर्चा में सुनाई पडने मे कठिनाई |
(४) रेडियो, टी.वी. कार्यक्रम सुनाई पडने में कठिनाई |
कान की संरचना
और उसकी कार्य विधि
कान की संरचना में कई स्तर
होते है | ध्वनि तरंगें सबसे पहले बाहरी कान में एकत्र होती हैं | फिर कान के परदे तक पहुचती है, जिससे उसमें तथा उससे जुडी
छोटी-छोटी तीन हडिड्यों में कम्पन उत्पन्न होता है | सबसे भीतरी व छोटी हडडी है स्टेपीस
(Stapes), जो ध्वनि-तरंगों को भीतरी कान या कॉक्लिया
(Cochlea) के सुनने में सक्षम हिस्से तक
पहुँचाती | यहाँ से ध्वनि - कम्पन्न सुनने की प्रक्रिया में सहायक एक
तंत्रिका को जाते हैं जो अंततः उन्हें दिमाग तक पहुँचा देती है | यह प्रक्रिया भी
बहरेपन के दो मूलभूत प्रकारों में विभेद करती है | कण्डक्टिव
(Conductive)- जो पर्दे व कान
की अंदरुनी हडिडयों से संम्बंधित है तथा सेन्सरीन्युरल, जिससे कॉकिल्या
(Cochlea) तथा सुनने
में सहायक तंत्रिका शामिल हैं | बहरेपनकी पुष्टि ऑडिओमीटर
(Audiometer) की मदद से होता है | रोग का
निदान होने पर ही संभब है | सुनाई पडने की क्षमता में कण्डक्टिव दोष दवाओं अथवा
ऑपरेशन द्वारा आमतौर पर सुधारा जा सकता हैं जबकि सेन्सरीन्युरल दोष सामान्यतः लाइलाज
है | इसमे ध्वनि प्रसार के लिए बहरेपन दूर करने की मशीन अथवा कॉकिलया का प्रत्यारोपण
आवश्यक हो जाता है
| अपने देश में
कण्डक्टिव बहरापन बहुत आम है लेकिन खेद का विषय है कि उन
पर ध्यान नही जाता अथवा उसे सुधारने के उपाय नही किये जाते
| आमतौर् पर एक गलत धारणा यह है कि इस स्थिति मे सुधार
कठिन अथवा असंभव है कण्डक्टिव बहरेपन के सामान्य कारण है -
(1) कान में खूँट या मैल,
(2) कान का बहना,
(3) ओस्साइकुलर [हडडी की] रुकाबट
(4) ओटोस्पंजियोसिस |
बहरेपन का सबसे प्रमुख कारण
है कान का बहना, आग मैं घी का
काम करते हैं ओटोटाँक्सिकं प्रकार के इयर ड्राँप्स (कान की
दबा) | इस स्थिति से उबरने का आसान उपाय है
टिम्पैनोप्लास्टी सरीखी साधारण सर्जरी | इसमें सिर्फ एक
दिक्कत है कि सर्जरी मैं माइक्रोस्कोप की जरुरत पडती है ,जिसे
माइक्रोसर्जरी मैं दक्ष व्यक्ति ही सिर्फ प्रयोग कर सकता
है इसके इस्तेमाल के सार्थक परीमाण हासिल हुए हैं |
एक अन्य समस्या है ओसाइकुर [बोनी या हडडी द्वार्] अवरोध, जिससे कण्डक्टिंग
(संवाही) ओसाइक्लिस
घिस जाती है अथवा स्थानापन्न हो जाती है ओसाइकुलर प्रत्यारोपण
द्वारा इन हालात से सरलतापूर्वक
निबटा जा सकता है जो प्राक्रतिक ओसाइकिलों की भूमिका
का निर्वाह करने लगते हैं संवाही ओसाइकिलों में से एक स्टेपीस नामक ह्ड्डी के स्थिर
हो जाने से अवरोध उत्पन्न होता है सरलतम उपाय है उस जगह स्टेपीस की जगह टेफ्लाँन से
बना
पिस्ट्न लगना जो बहुतेरों को लाभ पहुँचा चुका है |
अन्य प्रकार के बहरेपन का सबसे आम कारण है प्रेस्बाईएक्यूसिस अर्थात व्रद्धावस्था
के कारण अनिवार्यतः सेन्सरीन्यूरल क्षति | आमतौर पर इस रोग का स्वभाव है फैलते जाना
और यह स्थिति द्विविधाजनक होती है क्योंकि इससे आपसी बोलचल काफी हद तक प्रभावित होता
है | इसका प्रचलित उपचार है ऑडियोग्राम के कान में कोई भी मशीन नही लगानी चाहिए इससे
साफ सुनाई भी नही पडता और बहरेपन की समस्या विकटतर हो जाती है आज के युग में एक
अन्य आम रोग है ध्वनि प्रेरित या शोर के कारण बहसपन | कारखाना श्रमिकों ट्रैफिक
सिपाहियों व टेलीफोन आपरेटरों में ही नही आम जनता में भी इसका दुष्प्रभाव पड रहा
है | शोर से बहरेपन का कोई इलाज नही है सर्व श्रेष्ठ उपाय है इसकी रोकथाम | सेन्सरीन्यूरल,
प्रकार के बहरेपन के अन्य कारण् हैं सिर की चोट ,कान मे तकलीफ और दवाओं से
ओटोटाक्सिटी | इनमें बहुत ध्यान्पूर्वक अनिवार्य हस्तक्षेप की आवश्कता होती है | बच्चों
में सुनाई पडने की क्षमता पर विशेष जोर देना चाहिए | उनकी बोली साफ और विकसित हो,
बच्चों में बहरेपन की एक आन्य आम समस्या है स्त्रावक ओटाइटिस माध्यम, जिसमें
बार-बार होते स्वसन तंत्र के संक्र्मण् से कान के पर्दे के पीछे द्रव-पदार्थ एकत्र
हो जाता है इसमे बहरेपन के अलावा बच्चे पडाई से जी चुराते है तथा व्यवहारकुशल नही
होते, नतीजन उनका विकास रुक जाता है इस समस्या से निबटने के लिए खुले सिरे
कीवेटीलेटिंग ट्यूब् [विशेष प्रकार की नली] -ग्रोमेट का प्रत्यारोपण होता है जिससे
तत्काल साफ सुनाई पडने लगता है | यहाँ काँक्लिया-प्रत्यारोपण की चर्चा अप्रासगिंक न
होगी | यह बच्चे-बूढों के समान रुप से लगाया जाता है, जिनके कान की मशीन भी बेकार हो
जाती है | फिलहाल यह उपकरण महंगे हैं और कम ही इस्तेमाल हो रहे हैं
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